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डायरी
28.3.09
मेलघाट
जो तिनका-तिनका जोड़कर
जिंदगी बुनते थे
वो बिखर गए।
गांव-गांवटूट-टूटकर
ठांव-ठांव बन गए।
अब उम्मीद से
उसकी उम्र
और छांव-छांव से
पता पूछना
बेकार है।
15.1.08
नर्मदा मैया
नर्मदा मैया
तेरे सरसराहट प्रवाह से
आदिवासियों की
सहज-सुंदर अभिव्यक्तियाँ पूरी होती हैं!
कोई पर्वत भी
विचलित कर न सका
जिसे अपनी राह से
भला कोई बांध रोक सकेगा
उसे सागर मिलन की चाह से ?
(नर्मदा बचाओ आन्दोलन के साथियों के लिए)
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