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डायरी
28.3.09
मेलघाट
जो तिनका-तिनका जोड़कर
जिंदगी बुनते थे
वो बिखर गए।
गांव-गांवटूट-टूटकर
ठांव-ठांव बन गए।
अब उम्मीद से
उसकी उम्र
और छांव-छांव से
पता पूछना
बेकार है।
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